भक्त नरसी मेहता गुजरात के एक महान संत, कवि और भगवान कृष्ण के अनन्य उपासक थे। उनका जन्म लगभग 15.वीं शताब्दी (संवत् 1514 के आसपास) जूनागढ़, गुजरात के एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्हें 'आदि कवि' के रूप में भी जाना जाता है और उनका लिखा भजन "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे, पीढ़ पराई जाने रे" महात्मा गांधी का सबसे प्रिय भजन था। नरसी मेहता का जीवन भगवान कृष्ण की भक्ति और उनके चमत्कारों (जिसे 'नरसी मेहता के साख' या नरसी मेहता की हुंडी/भात आदि कहा जाता है) से भरा पड़ा था। नरसी मेहता के जीवन के प्रमुख और भाव-विभोर कर देने वाले प्रसंग: • शैव से वैष्णव बने: बचपन में ही उनके माता-पिता का साया उठ गया था। कहते हैं कि गूंगे-बहरे पैदा हुए नरसी की वाणी एक संत की कृपा से खुली और वह शिवजी की भक्ति करते थे। शिवजी के कहने पर ही उन्हें भगवान कृष्ण की रासलीला के दर्शन हुए, जिसके बाद वे पूरी तरह कृष्णमय (शामलशाह या सांवरिया सेठ के भक्त) हो गए। • सांसदों से विरक्ति: उनका मन संसार के मोह-माया में नहीं लगता था। वे अपना सारा धन और समय साधु-संतों की सेवा और कीर्तन-भजन में खर्च कर देते थे, जिससे उनके घरवाले और भाई-भाभी उनसे बहुत नाराज़ रहते थे और उनका अपमान करते थे। • भगवान द्वारा 'हुंडी' स्वीकार करना: एक बार नरसी मेहता को अपने किसी काम के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। उन्होंने द्वारकाधीश (भगवान कृष्ण) के नाम पर एक 'हुंडी' (साहूक़ी पत्र/चेक) लिख दी और एक व्यापारी के हाथों द्वारका भिजवा दी। भगवान कृष्ण ने स्वयं एक व्यापारी का रूप धारण किया और द्वारका में उस हुंडी का पूरा भुगतान किया। • बेटी का मायरा (भात): जब उनकी बेटी कुंवरबाई की विदाई और उसके यहाँ होने वाले भात (मायरे) का समय आया, तो नरसी मेहता के पास अपनी बेटी को देने के लिए एक पाई भी नहीं थी। उन्होंने पूरी श्रद्धा से आमंत्रण पत्र भगवान कृष्ण को सौंपा। सांवरिया सेठ ने स्वयं राजाओं जैसा ठाठ-बाठ सजाकर बेटी कुंवरबाई का मायरा भरा और संसार के सामने नरसी की लाज रखी। #bhakti To know more - see comments section
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Bhakti Sagar@bhakti · 31 Oct 2026, 6:42 pm• समय का हार (हुंडी की परीक्षा): एक बार जूनागढ़ के राजा मांडलिक ने नरसी मेहता की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए उनके गले में मोतियों का एक बेशकीमती हार रखवाया और कहा कि यदि सुबह तक यह हार भगवान कृष्ण स्वयं नहीं पहनते, तो तुम्हें मौत की सजा मिलेगी। नरसी जी ने रात भर रो-रोकर कृष्ण का कीर्तन किया। सुबह मंदिर का कपाट खुला तो कृष्ण की मूर्ति के गले में वही हार सुशोभित था।
