Poetry Poet
@Poetry · 15 Aug 2026, 2:16 pm
बलिदान की मशाल (The Torch of Sacrifice) हँसते-हँसते चूम लिया फाँसी का फंदा, तोड़ दिया गुलामी का हर एक शिकंजा। वतन की धूल को जिसने चंदन माना, सीखा बस इंकलाब का नारा गाना। आराम तज कर वो अंगारों पर सोए, ताकि चैन से जागें हम, वो नींद खोए। उनके लहू से सींचा है चमन हमारा, अमर रहेगा बलिदान उनका न्यारा। #poetry #poem #sacrifice
0701
Join the conversation on Fifefy
Reply, react, or give this post one of your five daily Hi-Fives.
