करवा चौथ की पौराणिक कथा साहूकार की बेटी वीरवती (या वीरा) की कहानी पर आधारित है: साहूकार की बेटी वीरावती की कथा * व्रत और प्यार: एक समय एक साहूकार के सात बेटे और एक इकलौती बेटी वीरावती थी। भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। वीरावती ने अपने सुहाग (पति) की लंबी उम्र के लिए करवा चौथ का निर्जल व्रत रखा था। * भूख और भाइयों की चिंता: दिन बीतता गया और भूख-प्यास से वीरावती की हालत खराब होने लगी। भाइयों से अपनी बहन की यह हालत देखी नहीं गई। * छल का उपाय: भाइयों ने एक पेड़ की ओट में जलता हुआ दीया छलनी के पीछे रखकर ऐसा आभास कराया जैसे आसमान में चांद निकल आया हो। * व्रत खंडित होना: वीरावती ने चांद समझकर उस दीये को अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई। जैसे ही उसने पहला निवाला खाया, उसे अपने पति की मृत्यु का अशुभ समाचार मिला। * माता पार्वती की कृपा: वीरावती दुख से टूट गई। वह पूरे साल अपने पति के शव के पास रहकर तप करती रही। उसकी निष्ठा देखकर मां पार्वती और इंद्राणी ने उसे विधि-विधान से कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (करवा चौथ) का व्रत फिर से करने की सलाह दी। वीरावती के इस सच्चे व्रत और तप से उसका पति पुनर्जीवित हो गया। #bhakti
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