हरियाली तीज व्रत कथा शिवजी ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के लिए यह कथा सुनाई थी। शिवजी कहते हैं—हे पार्वती! बहुत समय पहले तुमने हिमालय पर मुझे पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी। तुमने अन्न-जल त्याग दिया था और सूखे पत्ते चबाकर दिन काटे थे। कड़ाके की ठंड, चिलचिलाती धूप और भारी बारिश में भी तुम तपस्या में लीन रहीं। तुम्हारे पिता तुम्हारी इस हालत को देखकर बहुत दुखी थे। इसी दौरान नारद जी तुम्हारे पिता महाराज हिमालय के पास आए और कहा कि भगवान विष्णु तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं और वे तुमसे विवाह करना चाहते हैं। तुम्हारे पिता ने सहर्ष इस विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। जब तुम्हें इस बात का पता चला, तो तुम बहुत दुखी हुईं क्योंकि तुम मन ही मन मुझे अपना पति मान चुकी थीं। तुमने अपनी व्यथा अपनी एक सखी को बताई। तुम्हारी सखी तुम्हें एक घने जंगल में ले गई और वहाँ एक गुफा में छुपा दिया। सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को तुमने उस गुफा में रेत से शिवलिंग का निर्माण किया। रात भर जागकर मेरी आराधना की, व्रत रखा और लोकगीत गाए। तुम्हारी इस अटूट भक्ति और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मैं उसी समय उस गुफा में प्रकट हुआ और मैंने तुम्हें वरदान मांगने को कहा। तुमने मुझसे कहा कि हे महादेव! आप मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें। मैंने 'तथास्तु' कहकर तुम्हारी इच्छा पूरी की और अंतर्धान हो गया। अगले दिन सुबह तुमने व्रत का पारण किया और पूजा की सभी सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दिया। उसी समय तुम्हारे पिता तुम्हें ढूंढते हुए उस गुफा तक पहुंचे। तुमने उन्हें बताया कि तुमने अपना जीवन मुझे (शिवजी को) समर्पित कर दिया है और यदि वे तुम्हारा विवाह मेरे साथ करने को तैयार होंगे, तभी तुम घर लौटोगी। तुम्हारे पिता ने तुम्हारी ज़िद और भक्ति के आगे सिर झुकाया और बड़ी धूमधाम से हमारा विवाह करवाया। शिवजी ने कथा समाप्त करते हुए कहा—हे पार्वती! सावन शुक्ल तृतीया के दिन तुमने जो व्रत किया था, उसी के प्रभाव से हमारा मिलन संभव हो पाया। इसलिए जो भी स्त्री इस दिन पूरी श्रद्धा से यह व्रत और पूजा करेगी, उसे अखंड सौभाग्य का वरदान मिलेगा। जय शिव पार्वती माता की जय🙏
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