नीम का पेड़ माधव का पुश्तैनी मकान शहर के सबसे पुराने इलाके में था। आंगन के बीचों-बीच एक विशाल नीम का पेड़ खड़ा था, जिसे माधव के परदादा ने लगाया था। उस पेड़ की घनी छांव में माधव का बचपन बीता था। गर्मियों के दिनों में जब बिजली चली जाती, तो पूरी फैमिली उसी पेड़ के नीचे खटिया बिछाकर सोती थी। दादी माँ अक्सर उसी की टहनियों से दातुन तोड़कर लातीं और कहतीं, "यह पेड़ नहीं, हमारे घर का सबसे बड़ा बुजुर्ग है जो हर मुसीबत को अपने ऊपर झेल लेता है।" वक्त बदला और माधव के भाई शहर के नए हिस्से में शिफ्ट हो गए। उन्होंने मकान बेचने का फैसला किया ताकि मिले हुए पैसों से बड़ा फ्लैट खरीदा जा सके। बिल्डर ने जमीन देखने के बाद साफ कह दिया, "मकान तो ठीक है, लेकिन आंगन का यह नीम का पेड़ काटना पड़ेगा। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और यहाँ पार्किंग बनानी है।" माधव के भाइयों ने तुरंत हामी भर दी, पर माधव का दिल बैठ गया। उसने बहुत मिन्नतें कीं, लेकिन बहुमत भाइयों का था। पेड़ कटने के एक दिन पहले, माधव चुपचाप आंगन में आकर बैठ गया। उसने पेड़ के तने को छुआ, तो उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी अपने को आखिरी विदाई दे रहा हो। अचानक उसकी नजर पेड़ की जड़ के पास उगे एक नन्हे, हरे पौधे पर पड़ी। वह नीम का ही एक छोटा सा अंकुर था। माधव की आंखों में आंसू आ गए। उसने तुरंत खुरपी उठाई और बड़ी सावधानी से मिट्टी समेत उस नन्हे पौधे को गमले में निकाल लिया। अगले दिन जब कुल्हाड़ी की आवाज से आंगन गूंज उठा, माधव वहाँ से दूर अपने नए घर की बालकनी में था। उसने उस नन्हे पौधे को मिट्टी में रोप दिया था। पुराना पेड़ चला गया था, पर उसकी नस्ल और यादें अब भी जिंदा थीं। #story
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