सच्ची समझ एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बहुत सुंदर बर्तन और घड़े बनाता था। रामू अपनी कला में माहिर था, लेकिन वह बहुत जल्दबाज़ और लालची स्वभाव का था। वह चाहता था कि उसकी सारी मिट्टी की चीज़ें तुरंत बिक जाएं और वह रातों-रात अमीर बन जाए। उसी गाँव के दूसरे छोर पर बूढ़े सोमनाथ रहते थे। सोमनाथ भी मिट्टी के बर्तन बनाते थे, लेकिन उनके बर्तनों की चमक और मजबूती दूर-दूर तक मशहूर थी। रामू हमेशा यह देखकर जलता था कि सोमनाथ की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ क्यों लगी रहती है। एक दिन रामू सीधे सोमनाथ के पास गया और गुस्से में पूछा, "काका, हम दोनों एक ही मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं, फिर लोग आपके बर्तन ज्यादा दाम में क्यों खरीदते हैं? आप ऐसा क्या जादू करते हैं?" सोमनाथ मुस्कुराए और बोले, "बेटा, कोई जादू नहीं है। जब तुम बर्तन बनाते हो, तो तुम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ पैसे कमाने और काम जल्दी खत्म करने पर होता है। तुम मिट्टी को ठीक से गूंथते नहीं और बर्तनों को पूरी तरह पकने से पहले ही आग से निकाल लेते हो। मैं जब बर्तन बनाता हूँ, तो धैर्य रखता हूँ। मिट्टी को सही समय देता हूँ और आग की आंच को समझता हूँ।" रामू को बूढ़े काका की बात समझ नहीं आई। उसने अपनी ज़िद में आकर अगले दिन बहुत सारे बर्तन बनाए और उन्हें बिना सही समय दिए जल्दबाज़ी में भट्टी में पकाकर बाज़ार ले गया। रास्ते में अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। रामू के आधे से ज़्यादा बर्तन कच्चे होने के कारण पानी में घुलकर मिट्टी बन गए, जबकि सोमनाथ के पक्के बर्तन बारिश में भी सुरक्षित रहे। रामू को उस दिन अपनी गलती का अहसास हुआ। वह समझ गया कि जल्दबाज़ी और कम मेहनत से कभी स्थायी सफलता नहीं मिलती। कहानी की सीख (Moral of the Story): धैर्य और कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। किसी भी कार्य में पूरी लगन और सही समय देने से ही श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं, जल्दबाज़ी हमेशा नुकसान पहुँचाती है।
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