बरगद का गवाह (शैली: सामाजिक / ड्रामा) गाँव के मुहाने पर खड़ा वह विशाल बरगद का पेड़ सदियों पुराना था। उसने गाँव की तीन पीढ़ियों को बदलते देखा था। उसी पेड़ की छाँव में रामू और श्यामू ने बचपन में कंचे खेले थे और एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बने थे। दोनों ने कसम खाई थी कि वे बड़े होकर गाँव की तकदीर बदलेंगे। समय बदला और दोनों बड़े हुए। रामू पढ़-लिखकर शहर चला गया और एक बड़ा बिज़नेसमैन बन गया, जबकि श्यामू गाँव में ही रहकर खेती-बाड़ी करने लगा। सालों बाद, रामू वापस लौटा, लेकिन उसके इरादे बदल चुके थे। वह उस बरगद के पेड़ को काटकर वहाँ एक बड़ी फैक्ट्री लगाना चाहता था। गाँव वाले इस फैसले के खिलाफ थे, लेकिन रामू के पास कानूनी कागज़ात और ताकत थी।श्यामू उस बरगद के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने रामू से कहा, "रामू, यह सिर्फ एक पेड़ नहीं है। इसी की छाँव में हमारे दादाजी बैठते थे, इसी पर हमने अपनी दोस्ती की कसमें खाई थीं। क्या तुम अपनी जड़ों को ही काट दोगे?" रामू ने अहंकार में कहा, "पैसों के आगे इन जज़्बातों की कोई कीमत नहीं है।" जैसे ही कुल्हाड़ी चलाने वाले आगे बढ़े, अचानक मौसम बदल गया। बरगद के पत्तों से एक तेज़ सरसराहट की आवाज़ आई, जो किसी रोने की ध्वनि जैसी थी। उसी पल रामू की नज़र तने पर खुदे उस धुंधले नाम पर पड़ी जो उन्होंने बचपन में पत्थर से कुरेदकर लिखा था—'रामू-श्यामू पक्के दोस्त'। रामू का हाथ कांप गया। उसकी आँखों से अहंकार का पर्दा हट गया। उसने कुल्हाड़ी रुकवा दी और बरगद आज भी उस दोस्ती का गवाह बनकर खड़ा है। #story
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