सावन सोमवार व्रत की पौराणिक कथा एक बड़े अमीर साहूकार के घर में सब कुछ था, लेकिन कोई संतान नहीं थी। पुत्र प्राप्ति के लिए वह हर सोमवार को पूरी श्रद्धा से भगवान शिव और माता पार्वती का व्रत व पूजा करता था। उसकी भक्ति देख माता पार्वती ने शिव जी से उसे पुत्र देने का आग्रह किया। भगवान शिव ने वरदान तो दिया, लेकिन कहा कि इस बालक की आयु केवल 16 वर्ष होगी।कुछ समय बाद साहूकार के घर एक सुंदर बेटे का जन्म हुआ। जब वह 11 वर्ष का हुआ, तो उसे उसके मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। साहूकार ने रास्ते में जगह-जगह यज्ञ और दान करने को कहा था।रास्ते में एक नगर के राजा की बेटी की शादी थी। जिस राजकुमार से शादी होनी थी, वह एक आंख से काना था। उसके पिता ने धोखे से साहूकार के सुंदर बेटे को दूल्हा बनाकर मंडप में बैठा दिया और शादी करवा दी। लेकिन लड़के ने राजकुमारी के दुपट्टे पर लिख दिया कि 'तुम्हारी शादी मेरे साथ हुई है, पर जिसके साथ तुम्हें विदा किया जा रहा है वह काना है।' राजकुमारी ने यह पढ़कर काने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया।इसके बाद लड़का काशी जाकर पढ़ने लगा। जब वह ठीक 16 वर्ष का हुआ, तो उस दिन मामा ने यज्ञ रखा था। लड़का कमरे में सोने गया और अल्पायु के कारण उसके प्राण निकल गए। मामा को रोता देख वहाँ से गुजर रहे भगवान शिव और माता पार्वती रुक गए। माता पार्वती के बार-बार प्रार्थना करने पर भोलेनाथ ने दया कर बालक को दोबारा जीवित कर दिया।पढ़ाई पूरी कर जब लड़का वापस लौट रहा था, तो राजा ने उसे पहचान लिया और अपनी बेटी (राजकुमारी) को बहुत सारे धन के साथ उसके साथ विदा किया। उधर साहूकार और उसकी पत्नी बेटे के गम में जान देने वाले थे, तभी बेटा और बहू सकुशल घर लौट आए। भगवान शिव ने साहूकार के सपने में आकर कहा, "मैं तुम्हारे सावन सोमवार के व्रतों से प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम्हारे पुत्र को लंबी आयु दी है।" महत्व: जो भी सावन सोमवार का व्रत रखकर यह कथा सुनता है, भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
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