आखिरी पत्ता और नई सुबह रूपा एक गंभीर बीमारी से जूझ रही थी और अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए खिड़की के बाहर लगे एक पुराने पेड़ को देखा करती थी। पतझड़ का मौसम था और पेड़ के पत्ते एक-एक कर गिर रहे थे। रूपा ने अपने मन में यह निराशाजनक धारणा बना ली थी कि जिस दिन इस पेड़ का आखिरी पत्ता गिरेगा, उसी दिन उसकी सांसें भी थम जाएंगी। यह बात उसकी छोटी बहन जिया को पता चल गई। पेड़ पर अब सिर्फ तीन पत्ते बचे थे, फिर दो हुए और एक रात भारी तूफान आया। रूपा ने भारी मन से आँखें बंद कर लीं कि सुबह तक आखिरी पत्ता भी गिर जाएगा और सब खत्म हो जाएगा। अगली सुबह जब उसने डरते-डरते खिड़की के बाहर देखा, तो वह हैरान रह गई। वह आखिरी पत्ता तेज तूफान के बाद भी डाली पर शान से टिका हुआ था। उसे देखकर रूपा के अंदर जीने की एक नई उम्मीद जागी और उसने बीमारी से लड़ने का फैसला किया। हफ़्तों बाद जब रूपा ठीक होकर घर लौटने लगी, तो उसने खिड़की के पास जाकर उस पत्ते को गौर से देखा। वह कोई असली पत्ता नहीं था; जिया ने उस तूफानी रात में भीगते हुए खिड़की के बाहर प्लास्टिक का एक हरा पत्ता तार से बांध दिया था। जिया के उस छोटे से झूठ ने रूपा को एक नया जीवन दे दिया था। #story
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