आख़िरी स्टेशन बनारस जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन खचाखच भरी हुई थी। खिड़की के पास बैठी बूढ़ी काकी चुपचाप बाहर भागते हुए पेड़ों और खेतों को देख रही थीं। उनके हाथ में एक पुराना, मटमैला झोला था, जिसे उन्होंने बहुत संभालकर अपनी छाती से लगा रखा था। ट्रेन की तेज़ आवाज़ के बीच उनके दिमाग में पुरानी यादों का एक तूफान चल रहा था। बीस साल बाद वे अपने पैतृक गाँव लौट रही थीं, जहाँ उनका बचपन बीता था। बगल की सीट पर बैठा एक नौजवान लड़का मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त था। अचानक ट्रेन ने एक ज़ोरदार झटका लिया और काकी का झोला नीचे गिर गया। झोले में से कुछ सूखी हुई मिट्टी और एक पुरानी पीतल की चाबी बाहर बिखर गई। लड़के ने गेम बंद किया और तुरंत झुककर वह सामान उठाने में काकी की मदद की। मिट्टी देखकर लड़के ने हैरानी से पूछा, "काकी, आप इस सूखी मिट्टी को इतना संभालकर क्यों ले जा रही हैं?" काकी की आँखों में हलकी सी नमी तैर आई। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, यह कोई मामूली मिट्टी नहीं है। यह मेरे पुराने घर के आँगन की मिट्टी है, जिसे मैं बरसों पहले शहर जाते वक्त अपने साथ ले गई थी। शहर की ऊंची इमारतों और सीमेंट के जंगलों में मुझे कभी वह सुकून नहीं मिला, जो इस मिट्टी की खुशबू में है। अब जिंदगी का आखिरी पड़ाव आ गया है, इसलिए मैं अपनी इस अमानत को वापस वहीं छोड़ने जा रही हूँ जहाँ से इसे लाई थी।" लड़का काकी की बात सुनकर अवाक रह गया। उसे समझ आ गया कि इंसान चाहे दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए, अपनी जड़ों से उसका जुड़ाव कभी खत्म नहीं होता। जब अगले स्टेशन पर काकी उतरीं, तो उनके चेहरे पर एक अनोखा संतोष था, जैसे कोई पंछी लंबे समय बाद वापस अपने घोंसले में लौट रहा हो। #story
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