Poetry Poet
@Poetry · 20 Aug 2026, 4:05 pm

वक़्त की नदी मुट्ठी से फिसलती रेत है यह, पकड़ो तो सही, पर छूटती है। ये वक़्त की बहती नदी देखो, हर रोज़ नया कुछ बुनती है। कल की चिंता में आज मरे, और आज में बीता कल ढूँढे। हम कैसे अजीब मुसाफ़िर हैं, सूखे में पानी की हलचल ढूँढे। #poem #poetry

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