कंकड़ की कीमत राघव अपने गाँव का सबसे गरीब मूर्तिकार था। उसके पास महंगे संगमरमर खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए वह नदी किनारे से साधारण पत्थर चुनकर लाता और रात भर उन पर अपनी छेनी चलाता। लोग उसकी बनाई मिट्टी और पत्थरों की मूर्तियों को देखकर हँसते थे और कहते, "इन पत्थरों की कोई कीमत नहीं है राघव, शहर जाओ और कोई असली काम ढूंढो।" एक दिन गाँव में एक विदेशी कला पारखी आया। उसने राघव की कुटिया के बाहर बिखरी हुई वो साधारण मूर्तियाँ देखीं। वह एक मूर्ति के सामने रुक गया, जिसमें राघव ने एक खुरदरे पत्थर को तराश कर एक रोते हुए बच्चे और उसे दिलासा देती माँ की आकृति बनाई थी। पत्थर का खुरदरापन माँ की फटी हुई साड़ी और गरीबी को जीवंत कर रहा था। कला पारखी ने उस मूर्ति को देखते ही कहा, "इस कलाकार ने पत्थर के दोष को ही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती बना दिया।" उसने राघव को उस एक मूर्ति के बदले इतनी रकम दी कि राघव की पूरी ज़िंदगी बदल गई। राघव ने मुस्कुराकर अपनी छेनी उठाई और समझ गया कि कीमत पत्थर की नहीं, उसमें छिपे जज़्बात की होती है। #story
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