भ्रम का साया (The Shadow of Illusion) विक्रम एक नामी न्यूरोसाइंटिस्ट था, जिसने इंसानी दिमाग के भ्रम और यादों को समझने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी थी। उसका मानना था कि जिसे हम 'सच' कहते हैं, वह असल में हमारे दिमाग द्वारा बुना गया एक जटिल ताना-बाना मात्र है। लेकिन नियति का खेल देखिए, पिछले कुछ हफ्तों से विक्रम खुद एक अजीब सी परिस्थिति का सामना कर रहा था। रोज़ रात को ठीक 2:14 बजे उसकी नींद खुलती थी और उसे महसूस होता था कि घर के गलियारे में कोई चल रहा है। जब वह उठकर देखता, तो वहाँ कोई नहीं होता, सिवाय एक हल्की सी महक के, जो पुरानी किताबों और चंदन की थी। शुरुआत में विक्रम ने इसे काम का तनाव और insomnia मानकर नजरअंदाज कर दिया। उसने खुद को दिलासा दिया कि उसका दिमाग ही उसके साथ चालें चल रहा है। लेकिन कल रात जो हुआ, उसने उसके विज्ञान के सारे तर्कों को हिलाकर रख दिया। वह अपने बेडरूम में सो रहा था, जब अचानक उसे अपने चेहरे पर किसी की ठंडी उंगलियों का अहसास हुआ। वह हड़बड़ाकर उठा, कमरे की लाइट जलाई, पर हमेशा की तरह कमरा खाली था। जब वह पानी पीने के लिए आईने के सामने गया, तो उसने देखा कि आईने पर भाप से एक संदेश लिखा हुआ था—"तुम जाग क्यों नहीं जाते?" विक्रम का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने अपने पूरे घर में हिडन कैमरे लगवा दिए। अगले दिन, उसने पूरी रात जागकर कैमरों की लाइव फुटेज अपने लैपटॉप पर देखी। रात के 2:13 बजे तक सब कुछ सामान्य था। जैसे ही घड़ी में 2:14 हुए, स्क्रीन पर जो दिखा, उसने विक्रम के होश उड़ा दिए। फुटेज में वह खुद अपने बिस्तर पर शांति से सो रहा था, जबकि लैपटॉप के सामने बैठा वह खुद... गायब था! विक्रम ने घबराकर अपने हाथों को देखा। वे पूरी तरह से transparent हो रहे थे। तभी कमरे के कोने से एक जानी-पहचानी आवाज गूंजी, "मैंने कहा था न विक्रम, तुम जाग क्यों नहीं जाते?" विक्रम ने मुड़कर देखा। वहाँ व्हीलचेयर पर एक बूढ़ा व्यक्ति बैठा था, जिसका चेहरा बिल्कुल विक्रम जैसा था, बस उसकी आँखों में गहरी थकावट थी। बूढ़े विक्रम ने कहा, "तुम सिर्फ एक याद हो, विक्रम। एक भ्रम, जो मैंने अपनी जवानी के उन दिनों को दोबारा जीने के लिए बनाया था जब मैं चल सकता था और मेरी दिमागी हालत ठीक थी। असल में, हम एक मेंटल असाइलम में हैं और यह साल 2076 है।" #story #scifi Continue in comment section
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Story Telling@Story · 9 Sept 2026, 5:46 pmविक्रम का सिर चकराने लगा। उसके लैब, उसके रिसर्च, उसका आलीशान घर—सब कुछ ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा। उसने चीखने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज़ उसका साथ छोड़ चुकी थी। धीरे-धीरे कमरे की दीवारें सफेद अस्पताल के वार्ड में बदलने लगीं। नर्स की आवाज़ गूंजी, "डॉक्टर, मरीज़ नंबर 404 को फिर से दौरा पड़ा है, वह खुद को जवान डॉक्टर समझ रहा है।" विक्रम की आँखें बंद होने लगीं। उसका 'सच' एक बार फिर टूट चुका था, और वह अपने ही दिमाग के बनाए एक नए भ्रम की गहराई में डूब रहा था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
