जादुई कठपुतली हरिदास गांव-गांव जाकर कठपुतली का खेल दिखाया करता था। उसके पास कपड़ों और लकड़ी से बनी दर्जनों कठपुतलियां थीं, लेकिन उनमें से एक सबसे खास थी—'बीरू'। बीरू एक बहादुर राजकुमार की कठपुतली थी, जिसके चेहरे पर हरिदास ने बड़ी बारीकी से मुस्कान उकेरी थी। जब भी हरिदास बीरू के धागे खींचता, ऐसा लगता मानो बीरू में सचमुच जान आ गई हो। लोग दूर-दूर से उसका खेल देखने आते थे। एक साल गांव में भयंकर सूखा पड़ा। फसलें बर्बाद हो गईं और लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। हरिदास के खेल देखने अब कोई नहीं आता था क्योंकि लोगों के पास पैसे ही नहीं थे। भूखा-प्यासा हरिदास एक रात अपनी झोपड़ी में बैठा रो रहा था। उसने बीरू को देखा और कहा, "लगता है दोस्त, हमारा सफर यहीं खत्म होता है। कल मैं तुम्हें और बाकी साथियों को बाजार में बेच दूँगा ताकि कुछ अनाज खरीद सकूँ।" उसी रात, जब हरिदास सो रहा था, एक चमत्कार हुआ। बीरू के धागे अपने आप हिलने लगे। वह बक्से से बाहर निकला और अपनी नन्ही लकड़ी की तलवार लेकर झोपड़ी के बाहर चला गया। वह सीधे गांव के सूखे कुएं के पास पहुंचा। बीरू ने अपनी तलवार से कुएं की तली पर तीन बार वार किया। कहा जाता है कि उस रात कुएं के भीतर से पानी का एक सोता फूट पड़ा। सुबह जब गांव वालों के शोर से हरिदास की नींद खुली, तो पूरा कुआं लबालब भरा था। सब इसे भगवान का चमत्कार मान रहे थे। पर जब हरिदास ने झोपड़ी में जाकर देखा, तो बीरू बक्से में वापस लेटा था, पर उसके पैरों पर गीली मिट्टी लगी थी। हरिदास मुस्कुराया, उसने बीरू को गले से लगा लिया और बेचने का विचार हमेशा के लिए छोड़ दिया। #story
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