गोवर्धन धरण (इंद्र का अहंकार भंग) ब्रज के लोग हर साल बादलों के देवता इंद्र की बड़ी पूजा करते थे ताकि अच्छी बारिश हो। एक दिन सात वर्ष के कान्हा ने नंद बाबा से कहा, "पिताजी, हमारी आजीविका का मुख्य साधन तो यह गोवर्धन पर्वत और हमारी गाएँ हैं, जो हमें घास और पानी देती हैं। हमें इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए।" सभी ब्रजवासियों को कान्हा की बात सही लगी और उन्होंने इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी। इससे देवराज इंद्र अत्यधिक क्रोधित हो गए। उन्होंने ब्रज पर अपना गुस्सा निकालने के लिए मूसलाधार और विनाशकारी बारिश शुरू कर दी। चारों तरफ बाढ़ का माहौल हो गया और लोग डर के मारे कान्हा के पास भागे।तब श्री कृष्ण ने अपनी लीला दिखाई। उन्होंने पूरे गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली (कनिष्ठिका) पर उठा लिया। सभी ब्रजवासी, अपने पशुओं के साथ उस पर्वत के नीचे आ गए। कृष्ण ने सात दिनों और सात रातों तक बिना थके उस पर्वत को उठाए रखा, जिससे सभी की जान बची। इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ, उनका घमंड टूटा और उन्होंने आकर भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी। तभी से श्री कृष्ण का नाम 'गिरिधारी' पड़ा। #story #girdhari
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