आखिरी स्टेशन (शैली: हॉरर / डरावनी) अमित की नाइट शिफ्ट ख़त्म होते-होते रात के दो बज चुके थे। उसने आख़िरी लोकल ट्रेन पकड़ी। डिब्बा बिल्कुल खाली था। हर तरफ़ एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल ट्रेन की पटरियों की आवाज़ काट रही थी। अमित थका हुआ था, इसलिए उसने खिड़की से सिर टिकाया और आँखें बंद कर लीं। तभी अनाउंसमेंट हुआ: "अगला स्टेशन... अंतिम स्टेशन है।" अमित चौंक गया, क्योंकि उसका स्टेशन अभी तीन स्टॉप दूर था। उसने खिड़की से बाहर देखा, चारों तरफ़ घना कोहरा था और प्लेटफॉर्म पर कोई रोशनी नहीं थी। ट्रेन रुकी और दरवाज़े खुल गए। अमित ने देखा कि प्लेटफॉर्म पर अजीब से काले साए घूम रहे थे, जिनकी आँखें लाल चमक रही थीं। डर के मारे अमित डिब्बे के कोने में दुबक गया। उसने दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की, लेकिन बटन काम नहीं कर रहा था। तभी एक बूढ़ा आदमी उस खाली डिब्बे में चढ़ा। उसके पैर उल्टे थे और चेहरे पर मांस नहीं था। उसने अमित की तरफ़ देखा और एक भयानक मुस्कान के साथ कहा, "बेटा, इस ट्रेन से ज़िंदा इंसान कभी नहीं उतरते। यह रूहों का सफ़र है।" ट्रेन दोबारा चल पड़ी, लेकिन इस बार वह पटरियों पर नहीं, बल्कि सीधे पाताल की गहराइयों की तरफ़ बढ़ रही थी। अमित की चीख ट्रेन के हॉर्न के शोर में हमेशा के लिए दफ़्न हो गई। #story
Join the conversation on Fifefy
Reply, react, or give this post one of your five daily Hi-Fives.
