नमक का कटोरा (The Bowl of Salt) एक युवा लड़का अपनी ज़िंदगी की परेशानियों से बहुत परेशान था। वह एक बुद्धिमान साधु के पास गया और अपना दुख रोने लगा। साधु ने उसकी बात सुनी, रसोई में गए और एक मुट्ठी नमक लेकर आए। उन्होंने लड़के से कहा, "इस नमक को पानी के एक गिलास में डालो और इसे पी जाओ।" लड़के ने ऐसा ही किया। साधु ने पूछा, "इसका स्वाद कैसा है?" लड़के ने मुँह बनाते हुए थूका, "बहुत खारा और कड़वा!" साधु मुस्कुराए। उन्होंने लड़के का हाथ पकड़ा और उसे पास की एक खूबसूरत झील के किनारे ले गए। साधु ने फिर से एक मुट्ठी नमक झील के साफ पानी में डाल दिया और कहा, "अब इस झील का पानी पियो।" लड़के ने पानी पिया। साधु ने पूछा, "अब इसका स्वाद कैसा है? क्या तुम्हें नमक का पता चला?" लड़का हँसते हुए बोला, "नहीं, यह पानी बहुत मीठा और ताज़ा है।" साधु लड़के के पास बैठे और बोले, "बेटा, जीवन के दुख बिल्कुल इस नमक की तरह हैं—हमेशा एक जितने ही रहते हैं। लेकिन उस दुख का कड़वापन इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसे किस बर्तन में डाल रहे हैं। जब तुम्हारा दिल छोटा (गिलास जैसा) होगा, तो हर दुख कड़वा लगेगा। लेकिन जब तुम अपने दिल को बड़ा (झील जैसा) कर लोगे, तो बड़े से बड़ा दुख भी खो जाएगा।" सीख: जीवन की तकलीफें नहीं बदलतीं, लेकिन हमारा नज़रिया और हमारे दिल का दायरा उन्हें छोटा या बड़ा बना देता है।
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