अहंकार ही अंत एक गाँव में एक मूर्तिकार रहता था। वह इतनी सुंदर मूर्तियाँ बनाता था कि वे बिल्कुल जीवंत लगती थीं। एक दिन एक ज्योतिषी ने उससे कहा, "अगले रविवार तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।" मूर्तिकार डर गया। उसने यमदूत को चकमा देने की एक तरकीब सोची। उसने अपने जैसी ही हूबहू दिखने वाली दस मूर्तियाँ बनाईं। रविवार के दिन जब यमदूत उसके प्राण लेने आए, तो वे हैरान रह गए। वहाँ एक जैसे ग्यारह मूर्तिकार खड़े थे। यमदूत असली इंसान को पहचान नहीं पा रहे थे। वे बिना प्राण लिए वापस नहीं जा सकते थे। यमदूत ने मूर्तिकार के अहंकार को जगाने की सोची। वे बोले, "मूर्तियाँ तो शानदार हैं, लेकिन बनाने वाले ने एक बहुत बड़ी गलती कर दी है।" यह सुनते ही मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा। वह तुरंत बोल पड़ा, "कैसी गलती? मैंने कोई गलती नहीं की!" यमदूत मुस्कुराए और बोले, "बस यही गलती की कि तुम बोल पड़े।" यमदूत ने उसे पकड़ लिया। सीख: अहंकार और अति-चतुराई हमेशा इंसान के विनाश का कारण बनती है।
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