बेनाम चिट्ठी आनंद बाबू रेलवे विभाग से रिटायर होने के बाद एक शांत कस्बे में अकेले रहते थे। उनकी दिनचर्या बेहद साधारण थी—सुबह पार्क में टहलना, अखबार पढ़ना और शाम को घर के बाहर बैठकर चाय पीना। उनकी जिंदगी में कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं था, जब तक कि वह रहस्यमयी चिट्ठी उनके डाकबाक्स में नहीं आई। नीले रंग के लिफाफे पर कोई नाम या पता नहीं था, बस अंदर एक सफेद कागज पर लिखा था: "तीस साल पहले जो गलती आपने की थी, उसका हिसाब चुकाने का वक्त आ गया है। अगले रविवार को पार्क की बेंच नंबर 4 पर मिलें।"यह संदेश पढ़कर आनंद बाबू के हाथ कांपने लगे। तीस साल पहले? उन्होंने अपने दिमाग पर जोर डाला। उस वक्त वह एक बड़े रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे। क्या उनसे कोई बड़ी चूक हुई थी? कोई दुर्घटना? या किसी बेगुनाह के साथ नाइंसाफी? उन्होंने कई रातें जागकर काटीं, पर उन्हें कोई ऐसी बड़ी घटना याद नहीं आई जिसके लिए उन्हें दोषी ठहराया जा सके। डर और उत्सुकता के बीच रविवार का दिन आ गया। शाम के ठीक पांच बजे आनंद बाबू पार्क की बेंच नंबर 4 पर जाकर बैठ गए। उनका दिल तेजी से धड़क रहा था। तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति उनके पास आया और उनके बगल में बैठ गया। उसने आनंद बाबू को देखा और मुस्कुराया।"आप कौन हैं? और उस चिट्ठी का क्या मतलब है?" आनंद बाबू ने घबराकर पूछा। व्यक्ति ने जेब से एक पुरानी घड़ी निकाली और कहा, "बाबूजी, तीस साल पहले मैं एक अनाथ लड़का था जो भूख के मारे स्टेशन पर चोरी करते पकड़ा गया था। पुलिस मुझे जेल भेजने वाली थी, पर आपने मुझे बचाया, अपने पास से पैसे देकर खाना खिलाया और इस घड़ी को बेचकर पढ़ाई करने की सलाह दी। आज मैं एक सफल बिजनेसमैन हूँ। मैं बस आपका धन्यवाद करना चाहता था।" आनंद बाबू की आंखों में राहत और खुशी के आंसू छलक आए। #story
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