समय की रेत और दादाजी की डायरी राघव को पुरानी चीज़ों से गहरा लगाव था। कॉलेज की छुट्टियाँ होते ही वह अपने पैतृक गाँव चला जाता, जहाँ एक पुराना दुमंजिला मकान अतीत की कहानियाँ समेटे खड़ा था। इस बार, हवेली की पुरानी अटारी की सफ़ाई करते समय उसे धूल से सनी एक लाल मखमली डायरी मिली। यह डायरी उसके दिवंगत दादाजी, पंडित दीनानाथ की थी। राघव ने उत्सुकता से डायरी का पहला पन्ना पलटा। पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन उन पर नीली स्याही से लिखे शब्द आज भी जीवंत थे। वह कोई साधारण डायरी नहीं थी; उसमें दादाजी ने अपने जीवन के उन पलों को दर्ज किया था जब उन्होंने किसी अजनबी की मदद की थी या किसी के चेहरे पर मुस्कान बिखेरी थी। एक पन्ने पर लिखा था, "आज 12 अगस्त 1975 को मैंने शहर के चौराहे पर एक भूखे बच्चे को अपनी टिफिन की रोटियाँ दे दीं। उसकी आँखों में जो तृप्ति थी, उसने मेरे दिल को सुकून से भर दिया। शायद यही जीवन का असली गणित है—जितना बाँटोगे, उतना बढ़ेगा।" राघव पढ़ता गया और उसकी आँखें नम होती गईं। उसे समझ आया कि दादाजी समाज में इतने सम्मानित क्यों थे। उन्होंने धन-दौलत नहीं, बल्कि दुआओं की पूंजी कमाई थी। डायरी का आखिरी पन्ना खाली था, जिस पर लिखा था—"यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए।" राघव ने गहरी साँस ली। उसने जेब से अपना पेन निकाला और खाली पन्ने पर लिखना शुरू किया: "11 सितम्बर 2026, आज मैंने अपने दादाजी की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है..." अटारी की खिड़की से आती धूप राघव के चेहरे पर चमक रही थी, और गाँव की हवा में एक नया सवेरा मुस्कुरा रहा था। ------------------------------ #story
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