समय का बटुआ आनंद बाबू को उनके सत्तरवें जन्मदिन पर एक अजनबी ने एक पुराना चमड़े का बटुआ उपहार में दिया। उस अजनबी ने कहा, "यह कोई साधारण बटुआ नहीं है। इसमें पैसे नहीं, बल्कि आपके बीते हुए जीवन के वो पल हैं जो आपने दूसरों की मदद करने या मुस्कुराने में बिताए थे। जब भी आप अकेले महसूस करें, इसे खोल लीजिएगा।" आनंद बाबू ने इसे एक मज़ाक समझा और अलमारी में रख दिया। कुछ महीनों बाद, जब आनंद बाबू बहुत बीमार और अकेले थे, उन्हें उस बटुए की याद आई। उन्होंने कांपते हाथों से उसे खोला। बटुए के अंदर से कोई सिक्का नहीं निकला, बल्कि एक हल्की सुनहरी रोशनी निकली। उस रोशनी में उन्हें अपना वो दिन दिखा जब उन्होंने एक अनाथ बच्चे को खाना खिलाया था, और उस बच्चे की वो जादुई मुस्कान कमरे में गूंज उठी। फिर एक और पल निकला, जब उन्होंने अपनी पत्नी के आंसू पोंछे थे। आनंद बाबू का कमरा उन पुरानी खुशियों और यादों की गर्माहट से भर गया। उनका अकेलापन और बीमारी का दर्द गायब हो चुका था। वे समझ गए कि ज़िंदगी की असली कमाई तिजोरी में नहीं, बल्कि अपनों के चेहरों पर छोड़ी गई मुस्कान में होती है। #story
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